कहानी एक सही मार्गदर्शन और हौसलें की।

एक गाँव में एक गरीब परिवार रहता था।परिवार मे माँ, पिता और उनकी एक बेटी थी।उसका नाम संध्या था।संध्या बहुत ही बुद्धिमान, ईमानदार और एक गुणी लड़की थी।

वह पढ़ाई में इतनी होशियार थी कि कोई भी बात उसके दिमाग में बहुत जल्दी चली जाती थी।यानी उसका दिमाग बड़ा ही तेज था।वो स्कूल से सबसे होशियार होने के साथ ही अध्यापको द्वारा पूछे गये किसी भी प्रश्न का सही उत्तर सबसे पहले देनी वाली लड़की थी।लेकिन उसके माता-पिता गरीब थे।वे कृषि मजदूरी करके अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।

संध्या अपने माता पिता की इकलौती लड़की होने के कारण वे उससे बहुत प्यार करते थे।संध्या अपने माता-पिता के प्यार और उनकी मेहनत को समझती थी।वह जानती थी कि उसके माता-पिता उसके लिए कितनी मेहनत करते है। इस बात को महसूस करते हुए उसके कई सपने थे और वह भविष्य में कलेक्टर बनना चाहती थी।और अपने माता-पिता और गांव का नाम बड़ा करना चाहता था।

उसके गाँव में केवल 10वीं तक ही स्कूल था और आगे की शिक्षा के लिए उसके गाँव से 7-8 किलोमीटर दूर एक गाँव था जिसमें 12वीं तक पढ़ाई की व्यवस्था थी।लेकिन संध्या को डर था कि कहीं घर से बाहर पढ़ने के लिए बाहर गाव जाने देंगे या नही?क्योंकि गांव में कई माता-पिता अपनी बेटी को शिक्षा के लिए बाहर नहीं भेजते थे और उस उम्र में उनकी शादी करवा देते थे।

संध्या इस बात से डरी हुई रहती थी,लेकिन ये बात उसने किसी को नहीं बताइ। संध्या का डर दिन-ब-दिन बढ़ता जा रहा था। लेकिन कहते है ना, भगवान हमेशा मुसीबत के समय हमें रास्ता दिखाने में हमारी मदद करते हैं। इसी तरह संध्या के रमेश नाम के एक शिक्षक थे। उन्होंने छात्रों को हमेशा अच्छी शिक्षा दी और जीवन की कठिनाइयों का सामना करना सिखाया। और वह गरीबी को अच्छी तरह जानते थे।

क्योंकी उन्होंने भी गरीबी का अनुभव किया था। वे उन शिक्षकों में से एक थे जिनकी कहानी हर कोई सुनता था। देखते देखते सन्ध्या 10 वी मे आ गई और संध्या ने 10वीं की परीक्षा अच्छे अंकों से पास की। संध्या स्कूल ही नहीं जिले से भी अव्वल आई थी।हर जगह उसकी सराहना हुई। लेकिन वह अपनी आगे की पढ़ाई को लेकर आशंकित थी।

चुंकि आगे की पढ़ाई के लिए माता पिता को बताने का समय आ चुका था,इसीलिए जब उसने अपने माता-पिता से अपनी आगे की शिक्षा के बारे में पूछा तो उसके पिता ने उससे कहा कि “देखो बेटा,तुम अब तक गाँव में पढ़े हो,अब तुम्हें शिक्षा के लिए बाहर जाना पड़ेगा, और अगर वहाँ तुम्हें कुछ हो गया,हम समाज का सामना कैसे करेंगे”।

जब उसके पिता ये बातें कर रहे होते हैं, संध्या के स्कूल के शिक्षक संध्या को बधाई देने के लिए उसके घर आते हैं, गुरुजी को देखकर संध्या अपने माता-पिता को गुरुजी के बारे में बताती है। गुरुजी फिर उसके माता-पिता से कहते हैं, आपकी बेटी बहुत बुद्धिमान है, वह जिले से पहली है और अब आप उसे आगे की शिक्षा के लिए और बारहवीं में वह हमारे राज्य से प्रथम आए इसके लिए प्रोत्साहित करे।

गुरुजी की बातो को सुनकर संध्या के पिता गुरुजी से कहते हैं, हमारी स्थिति खराब है गुरुजी, हम संध्या की आगे की शिक्षा का खर्चा हम नही उठा पाएंगे। गुरुजी कहते हैं कि इसके बारे में चिंता मत करो ।

मैं संध्या की शिक्षा के लिए भुगतान करूंगा, क्योंकि इस दुनिया में मेरा कोई नहीं है, और मैंने गरीबी को बहुत करीब से देखा है। और मैं जीवन में इन सब बातों को ज्यादा महत्व नहीं देता। क्योंकि जो व्यक्ति इन बातों के बारे में सोचता रहता है वह हमेशा गरीब ही रहता है। मैं बस इतना ही समझता हूँ ।कि यदि हम कर्म करते रहेंगे तो ईश्वर हमें उसका फल अवश्य देगा।
गुरुजी से यह सुनकर, संध्या के पिता को एक नई प्रेरणा मिलती है और वे संध्या को आगे की शिक्षा के लिए गाँव के बाहर पढ़ने की अनुमति दे देते है। वह गुरुजी से यह भी कहते है । कि हम और अधिक मेहनत करेंगे और संध्या को पढ़ाएंगे।यदि हमें आपकी सहायता की आवश्यकता होगी तो आपको अवश्य बताएंगे। संध्या आगे की शिक्षा शुरू करती है।और 12वीं में संध्या पूरे राज्य से सबसे पहली आती है

जिसके बाद संध्या की आगे की पढ़ाई का सारा खर्च राज्य सरकार उठाती है। इसके बाद संध्या बिना पीछे देखे कड़ी मेहनत करती है और कुछ सालों के बाद संध्या का सपना पुरा होता है।वो कलेक्टर बन जाती है। लेकिन कलेक्टर बनने के बाद जब वह अपने गांव जाती तो उसके शिक्षकों का तबादला हो जाता है।वे उस गांव में नहीं पढ़ा रहे होते।बावजूद संध्या हमेशा गुरुजी की शिक्षाओं को याद करती है

और अपनी सफलता का श्रेय अपने गुरुजी को देती है।क्योंकि अगर गुरुजी ने उस दिन संध्या के माता-पिता को नहीं समझाया होता तो संध्या आज इस स्थान पर नहीं पहुँचती। एक दिन कलेक्टर संध्या जिले मे schools की जांच पड़ताल के लिए जाती है।एक गाव के स्कूल में जाते समय संध्या को एक शिक्षक की आवाज सुनाई देती है, जो बच्चों को प्रेरक बातें सिखा रहे होते है, जब संध्या उस कक्षा में जाती है।

उसे आँखों पर चश्मा लगा हुआ एक बूढ़ा आदमी दिखाई देता है।वो उन्हे झट से पहचान लेती है।वो उसके रमेश गुरुजी होते थे।संध्या उनके पास जाती है और उनके पैर छूकर उनका आशीर्वाद लेती है।
गुरुजी उसके सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते है,लेकिन वो संध्या को पहचान नही पाते।और पूछते है कि,”तुम कौन हो, मैंने तुम्हें नहीं पहचाना।”क्योंकि उन्हे लग रहा था कि वह व्यक्ति एक अजनबी व्यक्ति थी।संध्या उनसे इतने समय बाद मिली थी।

अब संध्या बड़ी हो गई थी इसलिए वह संध्या को पहचान नहीं पा रहे थे।लेकिन संध्या ने उसे पहचान लिया था , फिर संध्या ने अपने बारे में कहा कि सर मैं आपकी शिष्या हूं।आपने मेरे माता-पिता को मुझे पढ़ाने के लिए प्रेरित किया, सर मैने आपके द्वारा दिये गये हौसले से जमकर पढ़ाई की और खूब मेहनत कि और आज मै कलेक्टर बनी हूं, और यह सब आपके कारण संभव हो पाया है।यह बात सुनकर गुरुजी उसे पहचान लेते है और उसकी पीठ पर थपथपाते है,

और खुशी से कहते कि मुझे तुम जैसे छात्रों को पढ़ाने का अवसर मिला यह मेरा सौभाग्य मिला है।
यह कहकर एकबार फिर वो संध्या की पीठ पर थपकी देकर उसे भरपूर आशीर्वाद देते है।
निष्कर्ष:-अगर हम किसी चीज के लिए अपना दिमाग लगाते हैं, तो हम कुछ भी करके उसे हासिल कर सकते हैं,बस महत्वपूर्ण है कि हमारे प्रयास ईमानदार होंने चाहिए और हमे किसीकी अच्छी संगत या किसीका साथ होना चाहिए। हमारे जीवन में कुछ भी असंभव नहीं है।

हमें बस असंभव लगने वाले कार्यों को करने का तरीका खोजने की आवश्यकता है, फिर असंभव भी संभव हो जाता है।


Comments

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *