Life changing thoughts Moral of the Story सनकादि ऋषि (सनत्कुमार) कौन हैं ?

सनकादि ऋषि (सनत्कुमार) कौन हैं ?

सनकादि ऋषि (सनत्कुमार) कौन हैं ?

सनकादि ऋषि :- (सनकादि = सनक + आदि) से तात्पर्य ब्रह्मा के चार पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन व सनत्कुमार से है।

पुराणों में उनकी विशेष महत्ता वर्णित है। ये ब्रह्मा की अयोनिज संताने हैं और भगवान विष्णु के १ अवतार हैं , जो १० सृष्टियों में से ही गिने जाते हैं। ये प्राकृतिक तथा वैकृतिक दोनों सर्गों से हैं।

उत्पत्ति : – भगवान विष्णु का प्रथम अवतार सनकादि ४ मुनि हैं, वे परमात्मा जो साकार हैं उन्होंने लीलार्थ २४ तत्वों के अण्ड का निर्माण किया। उस अण्ड से ही वे परमात्मा साकार रूप में बाहर निकले।
उन्होंने जल की रचना की तथा हजारों दिव्य वर्षों तक उसी जल में शयन किया अतः उनका नाम नारायण हुआ।

आपो नरा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ता पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥

ब्रह्मा जी भगवान की स्तुति करते हैं :-

ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्।नान्यत्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासी ॥ (भागवत)

चिरकाल से मैं आपसे अन्जान था, आज आपके दर्शन हो गए। मैने आपको जानने का प्रयास नहीं किया, यही हम सब का सबसे बड़ा दोष है क्योंकि समस्त ब्रह्माण्ड में आप ही जानने योग्य हैं। अपने समीपस्थ जीवों के कल्याणार्थ आपने सगुण रूप धारण किया जिससे मेरी उत्पत्ति हुई।

निर्गुण भी इससे भिन्न नहीं।” श्री भगवान ने कहा “मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जाओ सृष्टि करो। प्रलय से जो प्रजा मुझमें लीन हो गई उसकी पुनः उत्पत्ति करो।” और भगवान अंतर्धान हो गए। ब्रह्मा जी ने सौ वर्षों तक तपस्या की।

उस समय प्रलयकालीन वायु के द्वारा जल तथा कमल दोनो आंदोलित हो उठे। ब्रह्मा जी ने तप की शक्ति से उस वायु को जल सहित पी लिया। तब आकाशव्यापी कमल से ही चौदह लोकों की रचना हुई। ईश्वर काल के द्वारा ही सृष्टि किया करते हैं अतः काल की सृष्टि दस प्रकार की होती है –

  1. महत्तत्व
  2. अहंकार
  3. तन्मात्राएँ
  4. इन्द्रियाँ
  5. इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता
  6. पंचपर्वा अविद्या (तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र)
    उपर उक्त छः सृष्टियाँ प्राक
  7. स्थावर
  8. तिर्यक्
  9. मनुष्य
    ये वैकृतिक सर्ग कहलाती है।
  10. दशम सृष्टि सनकादि

इन सृष्टियों से ब्रह्मा जी को संतुष्टि न मिली तब उन्होंने मन में नारायण का ध्यान कर मन से दशम सृष्टि सनकादि मुनियों की थी जो साक्षात् भगवान ही थे। ये सनकादि चार सनत, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार नामक महर्षि हैं तथा इनकी आयु सदैव पाँच वर्ष की रहती है। ब्रह्मा जी नें उन बालकों से कहा कि पुत्र जाओ सृष्टि करो।

सनकादि मुनियों नें ब्रह्मा जी से कहा “पिताश्री! क्षमा करें। हमारे हेतु यह माया तो अप्रत्यक्ष है, हम भगवान की उपासना से बड़ा किसी वस्तु को नहीं मानते अतः हम जाकर उन्हीं की भक्ति करेंगे।” और सनकादि मुनि वहाँ से चल पड़े। वे वहीं जाया करते हैं जहाँ परमात्मा का भजन होता है। नारद जी को इन्होंने भागवत सुनाया था तथा ये स्वयं भगवान शेष से भागवत श्रवण किये थे। ये जितने छोटे दिखते हैं उतनी ही विद्याकंज हैं। ये चारो वेदों के ही रूप कहे जा सकते हैं।

पुराणों अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र:-

मन से मारिचि,
नेत्र से अत्रि,
मुख से अंगिरस,
कान से पुलस्त्य,
नाभि से पुलह,
हाथ से कृतु,
त्वचा से भृगु,
प्राण से वशिष्ठ,
अंगुष्ठ से दक्ष,
छाया से कंदर्भ,
गोद से नारद,
इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार,
शरीर से स्वायंभुव मनु,
ध्यान से चित्रगुप्त आदि।

आओ जानते हैं ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार के बारे में संक्षिप्त में जानकारी।

ब्रह्मा की उत्पत्ति जल में उत्पन्न कमल पर हुई। उन्होंने कमल के डंठल के अंदर उतरकर उसका मूल जानने का प्रयास किया लेकिन नहीं जान पाए। तब वह पुन: कमल आकर कमल पर विराजमान होकर सोचने लगे कि मैं कहां से और कैसे उत्पन्न हुआ।

तभी एक शब्द सुनाई दिया ‘तपस तपस’। तब ब्रह्मा ने सौ वर्षों तक वहीं आंख बंद कर तपस्या की। फिर ब्रह्मा को भगवान विष्णु की प्रेरणा से सृष्टि रचना का आदेश मिला।

उन्होंने तब सर्वप्रथम चार पुत्रों की उत्पत्ति की। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार। ब्रह्मा ने इन्हें सृष्टि रचना की आदेश दिया। परंतु ये चारों भी सृष्टि रचना छोड़कर तपस्या में लीन हो गए।

अपने पुत्रों की इस हरकत से जब ब्रह्मा क्रोधित हुए तो उनकी भौहों से एक बालक का जन्म हुआ। यह बालक रोने लगा तो इसका नाम रुद्र रख दिया गया। फिर ब्रह्मा ने विष्णुजी की शक्ति से 10 तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया। उनके मुख से पुत्री वाग्देवी की उत्पत्ति हुई। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो अंश किए एक अंश से पुरुष रूप मनु और दूसरे से स्त्री रूप शतरूपा को जन्म दिया। मनु और शतरुपा की संतानों को रहने के लिए श्रीहरि ने वराह रूप धारण कर धरती का उद्धार किया।

धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

यह सभी सर्वदा पांच वर्ष आयु के ही रहे। न कभी जवान हुए ना बुढ़े। चार भाई एक साथ ही रहते हैं ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं।
चारों जहां भी जाते भगवान विष्णु का भजन करते उनके भजन-कीर्तन में ध्यानस्थ रहते थे। वे सर्वदा उदासीन भाव से युक्त होकर भजन साधन में मग्न रहते थे।

इन्हीं चारों कुमारों से उदासीन भक्ति, ज्ञान तथा विवेक का मार्ग शुरू हुआ जो आज तक उदासीन अखाड़ा के नाम जाना जाता है।

प्रलयकाल के समय जो वेद शास्त्र लीन हो गए थे इन चार कुमारों भगवान विष्णु के हंसावतार में पुनः प्राप्त किया।

सनाकादि ऋषियों ने अपना प्रथम उपदेश नारदजी को दिया था।

पुराणों में इन चारों कुमारों के श्राप और वरदान देने के कई किस्से और कहानियां हैं।
एक बार विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने इन्हें अंदर जाने से रोक दिया था जिसके चलते उन्होंने इन्हें धरती पर 3 जन्मों तक राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया था।
दोनों ही भाई बाद में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में। फिर रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्में और अंत में शिशुपाल और दन्तवक्र के रूप में जन्म लेकर श्रीहरि के हाथों मोक्ष द्वार गए।

राधे राधे श्री हरिवंश 🙏❤️

सनकादि ऋषि :- (सनकादि = सनक + आदि) से तात्पर्य ब्रह्मा के चार पुत्रों सनक, सनन्दन, सनातन व सनत्कुमार से है।

पुराणों में उनकी विशेष महत्ता वर्णित है। ये ब्रह्मा की अयोनिज संताने हैं और भगवान विष्णु के १ अवतार हैं , जो १० सृष्टियों में से ही गिने जाते हैं। ये प्राकृतिक तथा वैकृतिक दोनों सर्गों से हैं।

उत्पत्ति : – भगवान विष्णु का प्रथम अवतार सनकादि ४ मुनि हैं, वे परमात्मा जो साकार हैं उन्होंने लीलार्थ २४ तत्वों के अण्ड का निर्माण किया। उस अण्ड से ही वे परमात्मा साकार रूप में बाहर निकले।
उन्होंने जल की रचना की तथा हजारों दिव्य वर्षों तक उसी जल में शयन किया अतः उनका नाम नारायण हुआ।

आपो नरा इति प्रोक्ता आपो वै नरसूनवः।
अयनं तस्य ता पूर्वं तेन नारायणः स्मृतः॥

ब्रह्मा जी भगवान की स्तुति करते हैं :-

ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम्।नान्यत्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं मायागुणव्यतिकराद्यदुरुर्विभासी ॥ (भागवत)

चिरकाल से मैं आपसे अन्जान था, आज आपके दर्शन हो गए। मैने आपको जानने का प्रयास नहीं किया, यही हम सब का सबसे बड़ा दोष है क्योंकि समस्त ब्रह्माण्ड में आप ही जानने योग्य हैं। अपने समीपस्थ जीवों के कल्याणार्थ आपने सगुण रूप धारण किया जिससे मेरी उत्पत्ति हुई।

निर्गुण भी इससे भिन्न नहीं।” श्री भगवान ने कहा “मैं तुमसे प्रसन्न हूँ, जाओ सृष्टि करो। प्रलय से जो प्रजा मुझमें लीन हो गई उसकी पुनः उत्पत्ति करो।” और भगवान अंतर्धान हो गए। ब्रह्मा जी ने सौ वर्षों तक तपस्या की।

उस समय प्रलयकालीन वायु के द्वारा जल तथा कमल दोनो आंदोलित हो उठे। ब्रह्मा जी ने तप की शक्ति से उस वायु को जल सहित पी लिया। तब आकाशव्यापी कमल से ही चौदह लोकों की रचना हुई। ईश्वर काल के द्वारा ही सृष्टि किया करते हैं अतः काल की सृष्टि दस प्रकार की होती है –

  1. महत्तत्व
  2. अहंकार
  3. तन्मात्राएँ
  4. इन्द्रियाँ
  5. इन्द्रियों के अधिष्ठाता देवता
  6. पंचपर्वा अविद्या (तम, मोह, महामोह, तामिस्र, अन्धतामिस्र)
    उपर उक्त छः सृष्टियाँ प्राक
  7. स्थावर
  8. तिर्यक्
  9. मनुष्य
    ये वैकृतिक सर्ग कहलाती है।
  10. दशम सृष्टि सनकादि

इन सृष्टियों से ब्रह्मा जी को संतुष्टि न मिली तब उन्होंने मन में नारायण का ध्यान कर मन से दशम सृष्टि सनकादि मुनियों की थी जो साक्षात् भगवान ही थे। ये सनकादि चार सनत, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार नामक महर्षि हैं तथा इनकी आयु सदैव पाँच वर्ष की रहती है। ब्रह्मा जी नें उन बालकों से कहा कि पुत्र जाओ सृष्टि करो।

सनकादि मुनियों नें ब्रह्मा जी से कहा “पिताश्री! क्षमा करें। हमारे हेतु यह माया तो अप्रत्यक्ष है, हम भगवान की उपासना से बड़ा किसी वस्तु को नहीं मानते अतः हम जाकर उन्हीं की भक्ति करेंगे।” और सनकादि मुनि वहाँ से चल पड़े। वे वहीं जाया करते हैं जहाँ परमात्मा का भजन होता है। नारद जी को इन्होंने भागवत सुनाया था तथा ये स्वयं भगवान शेष से भागवत श्रवण किये थे। ये जितने छोटे दिखते हैं उतनी ही विद्याकंज हैं। ये चारो वेदों के ही रूप कहे जा सकते हैं।

पुराणों अनुसार ब्रह्मा जी के मानस पुत्र:-

मन से मारिचि,
नेत्र से अत्रि,
मुख से अंगिरस,
कान से पुलस्त्य,
नाभि से पुलह,
हाथ से कृतु,
त्वचा से भृगु,
प्राण से वशिष्ठ,
अंगुष्ठ से दक्ष,
छाया से कंदर्भ,
गोद से नारद,
इच्छा से सनक, सनन्दन, सनातन, सनत्कुमार,
शरीर से स्वायंभुव मनु,
ध्यान से चित्रगुप्त आदि।

आओ जानते हैं ऋषि सनक, सनन्दन, सनातन, सनतकुमार के बारे में संक्षिप्त में जानकारी।

ब्रह्मा की उत्पत्ति जल में उत्पन्न कमल पर हुई। उन्होंने कमल के डंठल के अंदर उतरकर उसका मूल जानने का प्रयास किया लेकिन नहीं जान पाए। तब वह पुन: कमल आकर कमल पर विराजमान होकर सोचने लगे कि मैं कहां से और कैसे उत्पन्न हुआ।

तभी एक शब्द सुनाई दिया ‘तपस तपस’। तब ब्रह्मा ने सौ वर्षों तक वहीं आंख बंद कर तपस्या की। फिर ब्रह्मा को भगवान विष्णु की प्रेरणा से सृष्टि रचना का आदेश मिला।

उन्होंने तब सर्वप्रथम चार पुत्रों की उत्पत्ति की। सनक, सनन्दन, सनातन और सनत कुमार। ब्रह्मा ने इन्हें सृष्टि रचना की आदेश दिया। परंतु ये चारों भी सृष्टि रचना छोड़कर तपस्या में लीन हो गए।

अपने पुत्रों की इस हरकत से जब ब्रह्मा क्रोधित हुए तो उनकी भौहों से एक बालक का जन्म हुआ। यह बालक रोने लगा तो इसका नाम रुद्र रख दिया गया। फिर ब्रह्मा ने विष्णुजी की शक्ति से 10 तेजस्वी पुत्रों को जन्म दिया। उनके मुख से पुत्री वाग्देवी की उत्पत्ति हुई। फिर ब्रह्मा ने अपने शरीर के दो अंश किए एक अंश से पुरुष रूप मनु और दूसरे से स्त्री रूप शतरूपा को जन्म दिया। मनु और शतरुपा की संतानों को रहने के लिए श्रीहरि ने वराह रूप धारण कर धरती का उद्धार किया।

धर्म ग्रंथों के अनुसार सृष्टि के आरंभ में लोक पितामह ब्रह्मा ने अनेक लोकों की रचना करने की इच्छा से घोर तपस्या की। उनके तप से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने तप अर्थ वाले सन नाम से युक्त होकर सनक, सनन्दन, सनातन और सनत्कुमार नाम के चार मुनियों के रूप में अवतार लिया। ये चारों प्राकट्य काल से ही मोक्ष मार्ग परायण, ध्यान में तल्लीन रहने वाले, नित्यसिद्ध एवं नित्य विरक्त थे। ये भगवान विष्णु के सर्वप्रथम अवतार माने जाते हैं।

यह सभी सर्वदा पांच वर्ष आयु के ही रहे। न कभी जवान हुए ना बुढ़े। चार भाई एक साथ ही रहते हैं ब्रह्मांड में विचरण करते रहते हैं।
चारों जहां भी जाते भगवान विष्णु का भजन करते उनके भजन-कीर्तन में ध्यानस्थ रहते थे। वे सर्वदा उदासीन भाव से युक्त होकर भजन साधन में मग्न रहते थे।

इन्हीं चारों कुमारों से उदासीन भक्ति, ज्ञान तथा विवेक का मार्ग शुरू हुआ जो आज तक उदासीन अखाड़ा के नाम जाना जाता है।

प्रलयकाल के समय जो वेद शास्त्र लीन हो गए थे इन चार कुमारों भगवान विष्णु के हंसावतार में पुनः प्राप्त किया।

सनाकादि ऋषियों ने अपना प्रथम उपदेश नारदजी को दिया था।

पुराणों में इन चारों कुमारों के श्राप और वरदान देने के कई किस्से और कहानियां हैं।
एक बार विष्णु के द्वारपाल जय और विजय ने इन्हें अंदर जाने से रोक दिया था जिसके चलते उन्होंने इन्हें धरती पर 3 जन्मों तक राक्षस योनी में जन्म लेने का श्राप दे दिया था।
दोनों ही भाई बाद में हिरण्याक्ष और हिरण्यकश्यप के रूप में जन्में। फिर रावण और कुंभकर्ण के रूप में जन्में और अंत में शिशुपाल और दन्तवक्र के रूप में जन्म लेकर श्रीहरि के हाथों मोक्ष द्वार गए।

राधे राधे श्री हरिवंश 🙏❤️

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