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आप इस अद्वितीय वायलिन की क्‍या कीमत लगाते हैं?

बात बहुत पुरानी है। एक शहर में किसी अमीर आदमी का सामान नीलाम हो रहा था। नीलामी करने वाला एक एक चीज को उठता, उसकी तारीफ करता और रख देता। लोग उसकी बोलियां लगाने लगते। एक से बढ़कर एक नायाब चीजें थीं और एक से बढ़कर एक उत्साह से लोग बोलियां लगा रहे थे। कुछ देर बाद उस नीलामी करने वाले ने एक वायलिन उठाया और कहा कि इस बेहतरीन वायलिन के लिए कितनी बोली लगाते हैं। भीड़ में से कोई आवाज नहीं आई, तब उसने खुब ही कहा 5000 रुपये। कोई आवाज नहीं ,3000 रुपये, 1000 रुपये, 500 रुपये, अच्छा 50 रुपये के बारे में क्‍या विचार है। उस व्यक्ति ने हसते हुए कहा। तभी भीड़ में से एक वृद्ध व्यक्ति आगे आया। उसने धीमी आवाज में कहा क्षमा कीजिए! क्‍या में आपका कुछ समय ले सकता हू?” धीरे-धीरे वह मंच तक पहुंचा। उसने नीलामी करने वाले के हाथ से वायलिन लिया और साफ किया। उसने धीरे धीरे उन सभी तारों को सुर में किया, उनमें थोड़ा बदलाव किया और वायलिन बजाना शुरू किया। मधुर संगीत का झरना फूट पड़ा। अलोकिक माधुर्य। लोग अवाक? स्तब्ध! मौन! विलक्षण स्वलहरी फूट रही थी।

लगभग आधा घटा वह वायलिन बजाता रहा और फिर उसने अचानक बंद किया तथा झुककर श्रोताओं का अभिवावन किया! एक क्षण मौन रहने के बाद हाल तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा। लोग उस वृद्ध व्यक्ति की ओर देख रहे थे। उस कलाकार ने वायलिन नीलामी करने वाले के हाथ पें दिया और आहिस्ता आहिस्ता कदम रखते हुए उस हाल से बाहर चला गया। और जैसे ही लोगों ने तालियां बजाना बद किया, नीलामी करने वाले ने कहा कि आप इस अद्वितीय वायलिन की क्‍या कीमत लगाते हैं? पीछे से आवाज आई 5000 रुपए! 7000 रुपए! 10000 रुपए/ 15000 रुपए! 20000 रुपए! 25000 रुपए! पच्चीय हजार एक/ पच्चीस हजार वो! पच्चीस : हजार तीन/ और वह वायलिन पच्चीस हजार रुपये में बिक गया। इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में थोड़ा-सा परिवर्तन हम लोगों के जीवन का मूल्य कई गुना बढ़ा देता है। जिस वायलिन को कोई पचास रुपये में लेने के लिए तैयार नहीं था, वही वायलिन पच्चीस हजार रुपये में बिक गया-थोडे परिवर्तन के बाद। तो क्‍यों न हम भी परिवर्तन को पहचानें एवं उसके लिए, तैयार रहें। अक्सर होता यह है कि हम लोग बदलाव के लिए तैयार नहीं होते हैं और जब वह आता है, तो हम लोग कहीं पिछड़ जाते हैं या कहीं खो… जाते हैं।

By MUKESH KUMAR SRIVASTAVA

I AM MUKESH KUMAR SRIVASTAVA

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